Friday, May 25, 2012

फिर कभी

आज नहीं फिर कभी मिलना हमसे अकेले
आज नहीं फिर कभी कर लेना हिसाब हमसे
लफ्ज़ नहीं हैं आज हमारे पास बयां करने को
फिर कभी सुन लेना बेवफाई का सबक हमसे
आज नहीं फिर कभी कर लेना हिसाब हमसे
कि नहीं है पैमाना आज दर्द का पास हमारे

ना जाने क्यूँ जिंदगी में हम यूँ जीते आये हैं
ना करना हमसे ये सवाल कभी
कि नहीं हमारे पास कोई पुख्ता जवाब
क्या किसी से हम यूँ बयां करें किसका हिसाब
वो चले गए जहाँ से हमारे हिजाब में छुपकर
अब नहीं पास हमारे उनके दिए ज़ख्मों का हिसाब

आज नहीं फिर कभी ले लेना हमारी जिंदगी की किताब
कि नहीं है हमारे पास उनके दिए ग़मों का कोई हिसाब
हलक में अकते हैं लफ्ज़ और आब-ऐ-तल्ख़ सूख गए
न इसका है हमें इल्म ना ही कर सकेंगे हम इसका हिसाब
आज नहीं फिर कभी मिलना हमसे अकेले
कि आज नहीं फिर कर लेंगे तुमसे जिंदगी का हम हिसाब

आज नहीं फिर कभी लेना हमसे बेवफाई का सबक
नहीं आज हमारे पास उनके दिए ज़ख्मों का कोई हिसाब.....

1 comment:

Rebellion said...

kya baaniyaa hua hai kya jo hisaab kitaad karega?

Nice Poem lil Bro