Monday, May 7, 2018

अंतर्मन की ज्वाला


अंतर्मन में बसी है जो ज्वाला 
ढूंढ रही है बस एक मुख 
इतने वर्षों जो पी है हाला 
बन रही है अनंत दुःख 

नागपाश नहीं कंठ पर ऐसी
जो बाँध दे इस जीवन हाला को 
प्रज्वलित ह्रदय में है ज्वाला ऐसी
बना दे जो हाला अमृत को 

ज्वाला जब आती है जिव्हा पर 
अंगारे ही बरसाती है 
हाला से प्रज्वलित है ज्वाला
जिसमें पुष्प नहीं खिलते है 

अंगारो में जब बसा हो जीवन 
ज्वाला की पीते हो हाला
अमृत कलश नहीं बनता जीवन 
जब ह्रदय में प्रज्वलित हो ज्वाला 

ऐसे बनते है मानव से ज्वालामुखी 
की आधर पर जिनके बसते अंगारे 
ह्रदय में जब प्रज्वलित हो ज्वाला 
पुष्पों की बहार नहीं लाती जिव्हा!!

Tuesday, February 13, 2018

जीवन द्वंद्व में लीन

जीवन द्वंद्व में लीन है मानव 
ढूंढ रहा जग में स्वयं को 
नहीं कोई ठोर इसका ना दिखाना 
दूर है छोर, ढूंढने का है दिखावा 

नहीं किसी को सुध है किसी की 
अपने ही जीवन में व्यस्त है हर कोई 
ढूंढ रहा है हर कोई स्वयं को 
छवि से भी अपनी डरता है हर कोई 

अपनों से भी परे है हर कोई 
जीवन यापन की कला आज है खोई 
दर्पण में ढूंढते हैं अपना प्रतिबिम्ब 
प्रतिबिम्ब में ढूंढते है अपना अवलम्बन 

दिखता नहीं जीवन का अर्थ कहीं 
जीवन की गहराई में जीवन ढूंढता हर कोई  
खोई आज नातों ने भी अपनी महत्ता कहीं 
क्योंकि ढूंढ रहा आज स्वयं को हर कोई 

नहीं ईश्वर के लिए भी आज समय 
क्योंकि ढूंढ रहा आज स्वयं को हर कोई 
दर्पण में ढूंढते हुए अपने प्रतिबिम्ब 
जीवन द्वंद्व में लीन है आज हर कोई