Friday, May 25, 2012

ना जाने क्यों

जब कभी सोचता हूँ में तुम्हारे बारे में
बस खो सा जाता हूँ तुम्हरे ही ख्यालों में
ना जाने क्यूँ फिर ख़्वाबों में तुम हो होती हो
ना जाने क्यों लबों पे तुम्हारा ही नाम होता है
कि आज ना तुम हो ना ही तुम्हारा पैगाम 
फिर भी क्यों आब-ऐ-तल्ख़ पर नाम  तुम्हारा है
कुछ तो कभी हमें भी बतलाते जाना 
कि क्यों पैगाम हमारे नज़रंदाज़ करते हो
जानते हैं की ना हम तुम्हारे हैं ना हो सकेंगे
इल्म ये भी है हमें की तुम ना थी ना रहोगी कभी
फिर भी ना जाने क्यों नज़रों को एक इन्तेज़ार रहता है
ना जाने क्यों फिर भी बेजुबान दिल  इस कदर धडकता है
कि ख्वाबों ख्यालों में तुम्हारे इस कदर मशरूफ हैं
ना हमें जिंदगी का रहा कोई इल्म ना मौत का डर है
जाने क्यों अब बस तुम ही तुम नज़र आती हो
ना जाने क्यों अब लबों पर सिर्फ तुम्हारा ही नाम है

1 comment:

Rebellion said...

saavan raa andhaa ne to bas haro haro ij nazar avelo, prem sagar mein gota lagai ne aur kai nazar avelo