Sunday, January 22, 2012

स्मृति

शहर छोड़ चले हम
चले अज्ञात अंधियारों में
स्मृति बस रह गयी हैं
उन गलियों चौबारों की

जहाँ खेल हम बड़े हुए
जहाँ सीखा हमने चलना
बोल चाल की उस दुनिया से
चले होकर हम अज्ञानी 

राह बदली शहर बदले
बदली हमारी चाल भी
ना बदला कुछ तो
थी वो हमारी स्मृति ही

भूलना चाहा बहुत हमने
चाह थी कुछ ऐसी ही
छोड़ चले थे बांधवों को
छोड़ आये हम खुद को भी

1 comment:

Mayank said...

Comment as received on mail -

Trapped in my past
I've lowered my mast
Of the great happening world
Left my flag unfurled

Thanks to my friend Bhaskar C