Thursday, January 12, 2012

दास्ताँ

आहट जो हुई दरवाजे पर
उनके आने का एहसास हुआ
जब नज़रें उठीं उनकी ओर
उनसे ही निगाहें चार हुई

कुछ ख़ामोश थी उनकी निगाहें
कुछ खामोश हुई हमारी नज़र
एक लम्हा कुछ यूँ ही गुजारा
खामोश निगाहों की गुफ्तगू में

कदम उनके भी लडखडाए
ज़रा हम भी डगमगाए
इश्क का ये सफर
था ही पथरीली राह में

ना आह निकली उनकी जुबां से
ना हमने कभी उफ़ तक की
दास्ताँ यूँ ही बन पड़ी
जब हमारी निगाहें चार हुई


2 comments:

ankahe alfaz said...

'कदम उनके भी लडखडाए
ज़रा हम भी डगमगाए
इश्क का ये सफर
था ही पथरीली राह में'

sir these line were awesome......

Mayank said...

Thanks Dost