Wednesday, January 18, 2012

हृदयगाथा

नैनं में नीर है, मष्तिष्क में अस्थिरता
चित्त  मेरा है आज अशांति का प्याला
ह्रदय में पीड़ा है, पीता मैं जिसकी हाला
अर्पण की है जीवन ने मुझे ऐसी अश्रुमाला

प्यास तेरी मैं कैसे बुझाऊं प्रिये 
जब पीता हूँ खुद  ह्रदय की ही हाला
व्यथा कुछ ऐसी है जीवन की
कि है मेरा मन ही एक मधुशाला

मधुता जीवन की में हार चुका कबसे
है अब तो आँखों से छलकती ये अश्रुमाला
गाथा ह्रदय की कैसे कहूँ मैं तुझसे प्रिये
कि  जीवन मेरा बन गया एक मधुशाला

प्याले में जो आज मद भरी है
है  वो मेरे ह्रदय की ही हाला
विषाक्त  है जीवन कुछ ऐसा
जैसे हो नीलकंठ की प्रतिमाला

जीवनपथ के ऐसे दोराहे पर खड़ा मैं
जहाँ नहीं कोई मार्गदर्शन करने वाला
द्विविधा और असमंजस में है मन
ये सोच कर किस ओर है जाना

हर सोच अलग है हर सुझाव है निराला
जिससे भी पूछता हूँ पथ अलग ही बतलाता
दृष्टिहीन है गंतव्य मेरे इस जीवन का
नहीं कोई साथी जो हाथ पकड़ मुझे दर्शाता

ह्रदय की मेरे पीड़ा आज बन गई है हाला
जग में विचरता मैं गूंथता अपनी अश्रुमाला
कुछ ऐसी है मेरे अनूठे जीवन की ये व्यथा
नहीं कोई जिसे समझाता में अपनी हृदयगाथा

1 comment:

Mayank said...

Hi,

I guess you got the point totally WRONG. This poem in no way represents state of my mind.

People who know me well, know it very clear and crisp that I am a person who Never gets in the situation of Dilemma. They know me from the perspective of clear thoughts and actions based on those thoughts....

Mayank