Tuesday, January 24, 2012

देवस्थली का मरघट

काव्य की इन पंक्तियों में
लहू के दो रंग दिखते हैं
शिव शम्भू की इस धरती पर
नरमुंड और कंकाल ही दिखते हैं

अग्नि जो आज प्रज्वल्लित हुई
कर रही नरसंहार है
विस्फोटों की इस गर्जन से
गूँज रही प्रकृति अपार है...

मुकुट भारत के शीश का
आज रक्त से सराबोर है
देवों का निवास था जो कभी
शान्ति का वहाँ अकाल है

इतने बरसों जो घर था मेरा
नहीं मिलता अब वहाँ बसेरा
अपने ही निवास क्षेत्र में जाकर
लगता है मैं परदेसी हूँ

धरा की इस धरोहर पर
गर्व है भारत को जिसपर
काल का आज ग्रास बना है
रक्तपान का थाल बना है

देवों का निवास था जो कभी
शान्ति का वहाँ अकाल है
शिव शम्भू की इस धरती पर

आज अशांति भरा काल है

1 comment:

Mayank said...

Comment as received on email -

May there be peace. May we live in peace and not in pieces!!!! Har har Mahadev!!!

Thanks to my friend - Bhaskar C