Monday, April 23, 2012

धरा की धरोहर

हरियाली की चादर ओढ़े
महक रही है वसुंधरा
बादलों का वर्ण ओढ़े
थीरक रहा अम्बर भी

नदियों में बहता पानी
मानो गा रहा हो जीवन संगीत
पांखियों के परों को देख
मानो नृत्य कर रही अप्सराएं

खेतों में लहलहाती उपज
फैला रही सर्व खुशहाली
सुंदरता की प्रतिमूर्ति बन
प्रकृति कर रही अठखेलियाँ

कितना स्वर्णिम है ये जगत
जिसमें रहता मानस वर्ग
क्यों  आज व्यस्त है वो
नष्ट करने धरा की धरोहर को

1 comment:

Rebellion said...

Dhara ri dharohar ri ginatee mein, khud aadam ro bhi naam aave, pan dekh logaan ne, bas marataa maarta jeeve