Saturday, May 4, 2013

एक खबर से दबी दूसरी ख़बर

सरबजीत सिंह की मृत्यु ने देश तो झंकझोर कर रख दिया, और इसपर मेरे एक मित्र अनूप चतुर्वेदी ने एक कविता लिखी....जिसको मैं आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ|  किन्तु उनकी कविता ने मुझे चंद पन्तियाँ लिखने पर प्रेरित किया, जो उनकी कविता के बाद आपके लिए प्रस्तुत हैं -

अनूप चतुर्वेदी की कविता -


बाँट रहे वो लाखों में, चल हम भी करोड़ दे आते हैं
किसी मजबूर की मजबूरी का तोल मोल कर आते है
"
देश का बेटा" कहने वाले तब कैसे मौन रह पाते थे
रिश्तेदार जब इसी बेटे के दर दर पर चिल्लाते थे

देखो वो मर जाएगा - बहन रो रो कर कहती थी
पर दर्द ऐसे मासूमों का सिर्फ सीमा रेखा सहती थी अच्छे इलाज़ का झांसा देते पर "ना पाक" उनके इरादे थे
इधर हमारे गण मन जन भी सिर्फ टी वी तकरार चलाते थे

और वो चुप नहीं है आज भी , घडियाली आंसू बहाते है
हमारी जेलों में जब पाक मजबूर पछताते हैं काश उस दिन हमको इंसानों की सीमा साफ़ दिख पाती तो
हिन्द पाक की पुलिस - जासूस नहीं कह पाती तो

हम दो देशों की बाड़ जाल में नहीं फंस पाते थे
ना इनके उनके नेता हमें शहीद बतलाते थे सब को जीतने वाला सर्वजीत इन देशों से हार गया
यू ऐन के मानवता मुखौटे को सरे आम धिक्कार गया

अभी सैंकड़ों और हैं , दोनों ओर जो रहम रहम चिल्लाते हैं
दोनों देश की जनता से न्याय की उम्मीद लगाते हैं क्योंकि सिर्फ सलाखें ही सह सकती है, "सर्व" के चीत्कार को
हम को , उनको और हमारे परिवारों की करुण पुकार को

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सर्व और हम, जो दोनों तरफ बंद हैं

मेरी चंद पंक्तियाँ और उनका मर्म - 

करते थे वो बातें केवल, मन तुम्हारा बहलाने को
एक बात को बढ़ा चढ़ा कर इतना करते
सिर्फ ध्यान तुम्हारा बाटने को....
एक आवाज़ तो तुम सुन चुके हो
पुकार एक और भी सुनते जाना
माँ के लाल की लाश जो तुम ढोते हो
जरा माँ की लाज भी बचाते जाना

(सरबजीत की मृत्यु पर तो सब बात कर रहे हैं....लद्दाख में चीन की घुसपैठ किसी को नहीं दिख रही) 

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