Sunday, December 16, 2012

क्या यही है

तेरे नैनों की बोलियाँ
तेरे अधरों की अठखेलियाँ
नाम किसका लेती है 
कि करती हैं किसकी ये खोज

तेरे क़दमों की ये आहट 
तेरे ह्रदय की घबराहट 
नाम किसका लेती है 
कि क्यूँ ये तुझे तडपाती हैं 

क्या यही तपस्या है तेरी 
क्या यही है तेरी प्रेमअगन 
क्या यही है श्रोत तेरे अश्रुओं का 
क्या यही है अंत तेरे जीवन का??

2 comments:

Freddie said...

Yeh poem kuch hazam nahi hui. Kehna kya chate ho?
Ab yeh mat kehna, Hajmola lo. Hehehehe

Mayank said...

Some Poems do not generally get through the mind in one shot. Some poems make sense only with time when you time and again read them.

This poem is a question to life from life and for life, so digesting it would be tough with one read and without getting deeper in the context :)