Monday, June 6, 2011

नासूर

आज वो गुज़ारा ज़माना याद आता है
हर एक बिता पल याद आता है
जिंदगी ने दिया जो ज़ख्म
वो नासूर बन उभर आता है
क्या खता थी मेरी ऐ खुदा
कि मने जिंदगी से ये सिला पाया है
ना कोई रंज न कोई गिला कर सकते हैं
कि दिल-ऐ-नासूर इतना गहरा पाया है

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