Thursday, September 19, 2019

वक़्त का पहिया

याद आते हैं बचपन के वो दिन 
जब खेलते थे हम गलियों में 
उधम जब करते थे दोस्तों संग 
हर त्यौहार पर होता था हर्षो-उमंग 

क्या दिन थे वो भी हमारे अपने 
कि बारिश की बूंदों में नाच उड़ते थे 
कलकल करते रह के पानी में 
कागज़ की कश्ती बना चलाया करते थे 

ना जाने कहाँ खो गए हैं वो दिन 
ना जाने कैसे अधूरी सी लगती है उमंग 
आज वो गालियां भी सूनी है 
सूना है हर घर का आँगन 

जहाँ बच्चे करते थे अठखेलियां 
वहां फैला है एक अजब सा सूनापन 
हाथों में मोबाइलफोन लिए 
बीत रहा है उनका बचपन 

ना गलियों में है वो रौनक
ना बरसात के बूंदों में कोई खनक 
अब तो बरसात है पानी भी बह जाता है 
अपनी बूंदो में कश्तियों की राह तकते   


Tuesday, September 17, 2019

दास्ताँ देश की

है ना अजीब दास्ताँ इस देश की
कि हर किसी ने चश्मा पहना है
किसी का चश्मा सब्ज़बाग़ दिखाता है
लेकिन ग़ुलामों के चश्में अंधा बनाते हैं
कुछ ज़ुबां पर सच्चाई लाते हैं
और कुछ प्रॉपगैंडा में खो जाते हैं
अब भाई बरसों से जो लूटते आए हैं
उनको हम कैसे लुटने दें
उनकी ४.८% GDP एक प्रगति थी
आज की ५% तो बँटा धार है
कैसे हम मान लें आज का सच
जब वो छीन रहे हैं साहब का हक़