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Friday, February 14, 2020

कुपित कुटिल भगवान

जीवन की कुछ अपनी ही गाथा है 
इसकी पहेलियाँ सागरमाथा है
तुम चाहे जितना भी जतन करो
यह कहेगा छलनी से जल भरो

जीवन की डोर है भगवान के हाथों में 
कहते फिर भी है कि भाग्य है कर्मों में 
फिर क्यों गीता के अध्याय में क्यों है 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन 

हर समय जीवन ज्ञान क्यों है देता 
कलयुग है, नहीं है यह युग त्रेता 
जीवन में कर्म जब सभी हैं करते 
भगवान फिर कुछ की झोली ही क्यों भरते

जीवन की यह पहेली है बहुत जटिल 
क्या कलयुग में भगवान भी हो गया कुटिल 
क्या वह भी अब हो चला है भ्रस्ट 
क्या उसका मन्त्र है जो चढ़ाएगा वही पाएगा 

अजब पहेली है गजब की है गाथा 
सुलझाना इसे है जैसे चढ़ना हो सागरमाथा 
जतन लाख कर लो फिर भी उसे नहीं मानना 
कुपित कुटिल भगवान से है अब तुम्हारा सामना 

Tuesday, September 17, 2019

दास्ताँ देश की

है ना अजीब दास्ताँ इस देश की
कि हर किसी ने चश्मा पहना है
किसी का चश्मा सब्ज़बाग़ दिखाता है
लेकिन ग़ुलामों के चश्में अंधा बनाते हैं
कुछ ज़ुबां पर सच्चाई लाते हैं
और कुछ प्रॉपगैंडा में खो जाते हैं
अब भाई बरसों से जो लूटते आए हैं
उनको हम कैसे लुटने दें
उनकी ४.८% GDP एक प्रगति थी
आज की ५% तो बँटा धार है
कैसे हम मान लें आज का सच
जब वो छीन रहे हैं साहब का हक़

Thursday, September 12, 2019

राजनीति का अधर्म

राजनीति का अधर्म है यह 
या है अधर्म की राजनीति 
नैतिकता जहां लगी दांव पर 
व्यक्तित्व का जहां हुआ संहार 

आलोचना जो करनी थी नेता की 
कर बैठे नीतियों का मोल 
व्यक्ति विशेष पर करनी थी टिप्पणी 
कर बैठे राष्ट्र का अपमान 

इतना भी क्या घमंड वर्षों का 
इतना भी क्या दम्भ पैसों का 
इतना भी क्या मोह सत्ता का 
इतना भी क्या घमंड पद का 

राजनैतिक अधर्म नहीं तो क्या है 
कि करते हो तुम राजद्रोह 
अधर्मी राजनीति नहीं तो क्या है 
कि करते हो तुम सत्ता से मोह 

राजनीति का धर्म यदि है कोई 
तो है राष्ट्र की सेवा 
नहीं राजनीति में ऐसा कोई  मोह 
जो खिलाए तुम्हें केवल मेवा

Wednesday, January 16, 2019

निद्रालिंगन

निशा के प्रथम प्रहर से प्रतिक्षित हैं
किंतु निद्रा हमें अपने आलिंगन में लेती नहीं
कविता की पंक्तियों में जब खोना चाहें
तब कविता की कोई पंक्ति कलम पर आती नहीं
किससे कहें और क्या कहें
कि अब तो शब्दावली भी साथ निभाती नहीं
निद्रालिंगन में जितना हम जाना चाहते हैं
निद्रा हमें अपने आलिंगन में लेती नहीं
ना जाने क्योंकर अब निद्रा भी
स्वप्न नगरी में हमें आने देना चाहती नहीं
उचित नहीं या व्यवहार निद्रा का
कि अब मश्तिष्क से शब्दावली साथ निभाती नहीं
कैसे कहें और कैसे मनाएँ निद्रा को
कि कोई राह तक रहा है हमारी कहीं
सवेरे के सूरज की किरणों के साथ
कोई बाट जोह रहा है हमारी कहीं
छोटी सी प्यारी नन्हीं सी एक परी है मेरी
जो कर रही घर पर प्रतीक्षा मेरी
बस घर जा कर उसको आलिंगन में ले सकूँ
है निद्रा इस लिए तू अभी मुझे आलिंगन में ले ले
निशा के प्रथम प्रहर से प्रतिक्षित हूँ मैं
कि निद्रा अब मुझे आलिंगन में ले ले
मेरी नन्ही से परी बाट जोह रही मेरी
कर रही मेरे आलिंगन की वो प्रतिक्षा
अब तो कविता की पंक्तियाँ भी पूर्ण हो चली
अब तो ले चल मुझे स्वप्नों की गली।।

Tuesday, January 8, 2019

पथभ्रष्ट

भ्रष्ट तुम मुझे कहते हो 
अपनी लीला जब करते हो 
क्यों भूल जाते हो अपनी करनी 
जब भूखों को रोटी नहीं देते थे 

जब देश में था चोरो का राज 
जब कर्मचारी नहीं करते थे काज 
कर्जे में डूबा था हर कण 
देश खो रहा था प्रगति का रण 

भ्रष्ट तुम मुझे कहते हो आज 
जब सही हो रहे हैं सारे काज 
जब देश कर रहा है प्रग्रति 
तुम कर रहे हो शब्दों की अति 

भ्रष्ट तुम मुझे जो कहते हो 
अपने अतीत में नहीं देखते हो 
भ्रष्ट के साथ पथभ्रष्ट थे तुम 
विद्वता के धन से वंचित थे तुम 

भ्रष्ट मैं हो सकता हूँ एक क्षण 
पर पथभ्रष्ट नहीं मेरा एक कण 
नहीं भ्रष्ट है मेरा अंतर्मन मेरी मति 
और देश मेरा कर रहा प्रगति|| 

Sunday, July 22, 2018

विचारों का अस्तित्व

जब विचारों का अस्तित्व शब्दों में मिल गया हो
जब शब्दों का अस्तित्व सुरों में मिल गया हो 
तब अपने अंतर्मन में दबी भावनाओं को मत दबाओ
कुछ क्षण का ही सही, कोलाहल सह जाओ

विचारों को आत्मघाती मत कभी बनाओ
कुछ क्षण ही सही, हाला तुम पी जाओ 
शिव नहीं तुम कि शब्दों का विश्राम कर पाओ
कोई नागराज नहीं हिसार विश हलक में थाम पाओ

भावनाओं का बवन्डर यूँ हीं कभी थमता नहीं
कभी शब्द तो कभी पीड़ा उभरता है कहीं
कुछ क्षण ही सही, इस बवन्डर तो मत रोको
अपने अंतर्मन से निकालो इस कलह को 

अपने विचारों को शब्दों को तनिक पिरोकर
कहीं कलाम से तो कहीं सुरों से तुम उभारो
मत रोको भावनाओं को द्वेष के डर से
कहीं यह डर ना मिला दे तुम्हें यमदूतों से!!


Friday, June 29, 2018

कोमलाँगी

गरज बरस मेघा सी क्यों लगती हो
चमक दमक बिजली सी क्यों चमकाती हो
क्यों काली घटाओं सा इन लटों को घुमाती हो
क्यों अपने नेत्रों से अग्निवर्षा करती हो

अधर तुम्हारे पंखुड़िया से कोमल हैं जो
उन अधरों से क्यों घटाओं सी गरजती हो
नेत्र विशाल कर माथे पर सलवटें
क्यों माश्तिष्क से विकार जागृत करती हो

हृदय से कोमलाँगी जो हो 
क्यों हृदय को शीर्ष पर पहुँचाती नहीं
नेत्रो से अधरों तक सुंदर 
क्यों नेत्रों से प्रेम वर्षा करती नहीं 

कैसे इस ललाट पर शिवनेत्र जगाकर
स्वयं में स्वयं को लुप्त करती हो
क्यों सरस्वती लक्ष्मी सी अपनी देह को
काली का स्वरूप दे जाती हो

गरज बरस मेघा सी क्यों लगती हो
चमक दमक बिजली सी क्यों चमकाती हो
नेत्रो से अधरों तक सुंदर 
क्यों नेत्रों से प्रेम वर्षा करती नहीं

जीवनसंगिनी

धरा की धरोहर सा संजोया जिसे 
अंतर्मन में बसा आत्मा बनाया जिसे 
स्वयं को छोड़ अपनाया जिसे 
तुम्ही हो अर्धांगिनी मैंने बनाया जिसे 

परमात्मा के परोपकार से जो मिली 
धर्मात्मा के आशीर्वाद से जो मिली
अग्नि के साक्ष्य में जो मिली 
वही हो तुम तो मेरी जीवनसंगिनी बनी 

कहीं तुम्हारी सफलता ही है लक्ष्य मेरा 
जीवन द्वंद्व तो मात्र है समय का फेरा 
नहीं बनाने दूंगा मष्तिस्क की चिंताओं का डेरा 
सफल हो तुम यही ध्येय है मेरा 

चिंतन मनन में तो तुम मेरी संगिनी
तुम्ही हो जिससे है मेरी जीवन रागिनी 
कहीं दूर स्वप्न सा जो है दिखता 
वही है द्वार जिसमें मेरा विश्व है बसता 

संग मेरे ही तुम चलो सदा 
पथ कठिन होगा बनो तुम सहारा 
संग चलते हुए बल ही मिलेगा 
स्वप्न संग चलकर ही साकार होगा 

अंतर्मन में बसा आत्मा बनाया जिसे 
स्वयं को छोड़ अपनाया जिसे
अग्नि के साक्ष्य में जो मिली 
वही हो तुम तो मेरी जीवनसंगिनी बनी

Monday, May 7, 2018

अंतर्मन की ज्वाला


अंतर्मन में बसी है जो ज्वाला 
ढूंढ रही है बस एक मुख 
इतने वर्षों जो पी है हाला 
बन रही है अनंत दुःख 

नागपाश नहीं कंठ पर ऐसी
जो बाँध दे इस जीवन हाला को 
प्रज्वलित ह्रदय में है ज्वाला ऐसी
बना दे जो हाला अमृत को 

ज्वाला जब आती है जिव्हा पर 
अंगारे ही बरसाती है 
हाला से प्रज्वलित है ज्वाला
जिसमें पुष्प नहीं खिलते है 

अंगारो में जब बसा हो जीवन 
ज्वाला की पीते हो हाला
अमृत कलश नहीं बनता जीवन 
जब ह्रदय में प्रज्वलित हो ज्वाला 

ऐसे बनते है मानव से ज्वालामुखी 
की आधर पर जिनके बसते अंगारे 
ह्रदय में जब प्रज्वलित हो ज्वाला 
पुष्पों की बहार नहीं लाती जिव्हा!!

Tuesday, February 13, 2018

जीवन द्वंद्व में लीन

जीवन द्वंद्व में लीन है मानव 
ढूंढ रहा जग में स्वयं को 
नहीं कोई ठोर इसका ना दिखाना 
दूर है छोर, ढूंढने का है दिखावा 

नहीं किसी को सुध है किसी की 
अपने ही जीवन में व्यस्त है हर कोई 
ढूंढ रहा है हर कोई स्वयं को 
छवि से भी अपनी डरता है हर कोई 

अपनों से भी परे है हर कोई 
जीवन यापन की कला आज है खोई 
दर्पण में ढूंढते हैं अपना प्रतिबिम्ब 
प्रतिबिम्ब में ढूंढते है अपना अवलम्बन 

दिखता नहीं जीवन का अर्थ कहीं 
जीवन की गहराई में जीवन ढूंढता हर कोई  
खोई आज नातों ने भी अपनी महत्ता कहीं 
क्योंकि ढूंढ रहा आज स्वयं को हर कोई 

नहीं ईश्वर के लिए भी आज समय 
क्योंकि ढूंढ रहा आज स्वयं को हर कोई 
दर्पण में ढूंढते हुए अपने प्रतिबिम्ब 
जीवन द्वंद्व में लीन है आज हर कोई 


Friday, February 9, 2018

मर्यादा में जीना सीखो

आनंदन नहीं दिखता इनको
जो अफ़ज़ल पर रोए हैं
राम इनको काल्पनिक दिखता
बाबर इनका महकाय है

रामायण इनकी है कहानी मात्र 
किंतु शूर्पणखा एक किरदार है
महिसासुर इनको खुद्दार दिखता
दुर्गा नाम से इनका क्या पर्याय है

राष्ट्र विरोधी कथनो और नारों में 
दिखती इन्हें अपनी स्वतंत्रता है
वन्दे मातरम के उच्च स्वर में
गूँजती इनकी असहिष्णुता है 

कलबुर्गी की हत्या पर सरकार नपुंसक थी 
किंतु संतोष की हत्या पर बस चुप्पी है
घोड़े, कुत्ते का जीवन उनको जो प्यारा है 
 बिन गौ माँस का खाना उनका अधूरा है

होली पर बहते पानी पर रोते हैं
दिवाली की आतिशबाज़ी से डरते हैं
बात वहीं हो जब रोमन नव वर्ष की 
बाँछे इनकी खिल खिल उठती हैं

भूल गए हैं ये आज़ाद और भगत सिंह को
कसाब इनका बेटा ही लगता है
लाखों प्रकरण विचाराधीन है न्यायपालिका में
फिरते हैं अर्धरात्रि में आतंकी को क्षमा दिलाने

आज फिर एक बार राष्ट्र ने पुकारा है
मर्यादा पुरुषोत्तम ने नाम से हुंकारा है
तज अपनी मदभरी चाल को 
मर्यादा में फिर जीना सीखो



मात-पिता

नैनो की भाषा ना समझ पाए 
ना समझ पाए उनके कुछ संकेत
अधरों से वो कुछ बोल ना पाए
हृदय को हमारे छू ना पाए

बढ़े थे जिस डगर पर साथ उनके
उसपर झुककर उन्हे संभाल ना पाए
एक छोर तक साथ चले वो हमारे
उसके आगे हम उन्हें थाम ना पाए

कुछ भाषा ना हम पढ़ पाए 
कुछ शब्द वो बोल ना पाए
उनके सहारे चलना तो सीखा
किंतु साथ उनके हम चल ना पाए

पंछी बन उड़ चले वो गगन में
नाता हम उनसे जोड़ ना पाए
बरसों जिनसे प्रेम ही पाया
जीवन में उन्हें रोक ना पाए

आज भी जब देखते हैं उस छोर पर
अश्रुधारा ही बहती है नैनो से
कंठ से सवार नहीं निकलते हैं
जब स्मरण में उनकी छवि है आती।



Monday, August 21, 2017

दम्भ में चूर ईश्वर

दम्भ प्राकृतिक है या प्रकृति
कैसे करें है कैसी यह शक्ति
विचार विमर्श भी किससे करें
अपनी व्यथा कहाँ धरें
हर और यहाँ दम्भ है फैला
जीवन को क़र गया मटमैला

जिससे पूछो दम्भ की औषधि
जताता है वही दम्भ की विधि
पंहुचा ईश्वर के भी द्वार
की प्रार्थना कर दम्भ का संहार
दम्भ से भरा ईश्वर भी बोला
मानव है तू बहुत ही भोला

मन में सोचा कैसी है यह ठिठोली
दम्भ में चूर ईश्वर की भी बोली
ईश्वर फिर बोला है मानव
दम्भ ही तो है सृष्टि में दानव
दानव का कर दूँ यदि मैं संहार
कौन करेगा इस जग में मेरा प्रचार

पा कर ईश्वर को भी दम्भ में चूर
छोड़ आया मैं आस अपनी दूर
दम्भ में ही जीवन है मरण
दम्भ में ही ईश्वर का भी है स्मरण
दम्भ में जब है ईश्वर
तब कैसे होगा दम्भ का संहार

दम्भ प्राकृतिक है या प्रकृति
कैसे करें है कैसी यह शक्ति
हर और यहाँ दम्भ है फैला
जीवन को क़र गया मटमैला
दम्भ में चूर ईश्वर भी बोला
मानव है तू बहुत ही भोला

Saturday, April 29, 2017

सिंगार

कोई बादर गरजे, कहीं बिजुरिया चमके 
जब तेरा कंगना खनके 
अंगना मेरा महके, चिड़िया वहां चहके 
जब पायल तेरी छमके 

झुमका तेरा मचाये शोर 
बिंदिया तेरी उड़ाए निंदिया 
अधरों पर तेरी गुलाब सी लाली 
नैना जैसे हो काजर से काली 

गजरे से तेरे उठी वो महक 
ह्रदय भी उससे गया चहक 
ना कोई बदरा ना कोई बिजुरिया 
सिंगार में तू लगे है कोयलिया 

कहीं बादर गरजे, कहीं बिजुरिया चमके 
जब तेरे पैरों में पायल खनके 
हर क्षण घर मेरा महके 
जब तू मेरे अंगना में चहके|| 

Thursday, March 16, 2017

चैना

अजहुँ ना आये चैना, काहे बीती ये रैना
बलम मोरे कहाँ खोये, सूनी बीती ये रैना 
बोले पपीहरा, नाचे मयूर, कैसे बिताऊं मैं रैना
हाय सुनी सुनी बिताऊं मैं कैसे ये रैना

Wednesday, January 18, 2017

कल्पना

कल्पना मेरी जीती है शब्दों में
शब्दों से हूँ मैं खेलता
कल्पना में नहीं जी सकता मैं
जीता हूँ कल्पना अपनी शब्दों में

जीवन कल्पना नहीं एक सच है
कल्पना में जीना नहीं है मुझे
शब्दों को पिरो मैं लिखता हूँ
वर्णमाला से गीत बनाता हूँ

शब्दों में मेरे एक सच है 
जीती है इनमें मेरी कल्पना
कल्पना में नहीं है मेरा जीवन 
जीवन की कल्पना मैं शब्दों में कहता हूँ

कल्पना मेरी जीती है शब्दों में
शब्दों से मैं सच कहता हूँ
नहीं जी सकता मैं कल्पना में
मेरी कल्पना शब्दों में बहती है 

जीवन कलह

कलह अंतर्मन का कहता है मेरी सुन
हृदयालाप कहे तू मेरी सुन
मष्तिष्क में भी मचा है कोलाहल 
नहीं है स्थिर जीवन, पनप रहे उग्र विचार 

नहीं चाहता जीवन में कोई अल्पविराम 
नहीं चाहता कोई जीवन में स्थिर कोलाहल 
किन्तु जीवन फिर भी है अस्थिर
जीवन में फिर भी है एक कलह 

हलाहल जीवन की मैं पी चुका 
कोलाहल फिर भी मिटा नहीं 
जीवन हाल बन गई अश्रुमाला 
कोहराम फिर भी थमा नहीं 

कैसे कहूँ, किससे पूछूँ कैसी है विडम्बना 
कैसे जिऊँ, किससे जानू मैं इसका उत्तर 
कलह अंतर्मन का कहता है मेरी सुन
किन्तु नहीं पिरो सकता मैं उससे वर्णमाला 

Wednesday, December 14, 2016

विमुद्रीकरण पर सिकी राजनीति की रोटी

विमुद्रीकरण किस प्रकार चिंता जनक है 
कि विमुद्रीकरण की कतार में हुई मृत्यु 
एक राजनितिक पहलू बन जाता है 
बिना किसी पुष्टिकरण है 
पत्राचार का एक बन जाता है 

इन बुद्धिजीविओं से विनती है 
यदि तुम चाहते हो ऐसे ही विषय 
तो जरा ध्यान लगाना दक्षिण में 
कुछ वहां भी सिधार गए है 
अम्मा के निधन के समाचार से 

कुछ इन पहलुओं पर भी करना विचार 
कि होते है निधन के और भी कारक 
और यदि विमुद्रीकरण है कारक 
तो हर वह कारक निधन का 
जड़ से समाप्त करने की करो तुम मांग 

क्या इससे पहले कभी कोई कतार में नहीं लगा 
क्या नहीं हुआ निधन किसी का किसी कतार में 
अरे बुद्धिजीविओं, क्यों जाते हो भूल 
जाने कितने ही सिधार गए है राशन की कतार में 
कभी तुमने वहां तो स्वरोच्चारित नहीं किया 

जाने कितने सिधार गए कहीं किसी कतार में 
नहीं सुनी मैंने कहीं मांग 
उस कटारट के कारक को समाप्त करने की 
आज क्या योजन है की अकस्मात ही 
सारे बुद्धिजीवी जाग उठे 

कहीं किसी का निधन एक शुन्य सा लगता है 
कहीं किसी परिवार में जब अपना सिधार जाता है 
ऐसे पहलुओं पर जरा तुम विचार करना 
अपनी राजनीति की रोटी सेकने तुम 
किसी मृत की चिता पर मगरमच्छ के आंसू ना बहाना।।

Thursday, December 8, 2016

कैसे करे अब स्वयं को चैतन्य

आज की समय में कौन अपना है कौन पराया
कैसे पहचान करें किसमे राम किसमे रावण समाया
कैसे स्वयं को कोई चैतन्य करे
जब भगवान का मोल भी यहाँ पैसों में धरे
नहीं मिलता बिन माया के कुछ संसार में
बिन माया अपने भी दिखाते हैं बेग़ानो में
कैसे करे अब स्वयं को हम चैतन्य
कि अब रहते हैं रिश्तों की क़ब्र में
कहाँ जाएँ हम ढूँढने अपनों को
कि बिन माया अपने भी दिखाते हैं बेग़ानो में

Friday, September 23, 2016

मैं शिव हूँ, शिव् है मुझमें

मैं शिव हूँ, शिव् है मुझमें 
ये राष्ट्र मेरा शिवाला 
हाँ हूँ मैं शिव और शिव है मुझमें 
पीता आया हूँ बरसों से मैं हाला 

एक युग बीत गया तपस्या में
फिर भी नरसंहार हुआ है 
एक युग हुआ मेरे आसान को 
फिर भी विनाश नहीं है थमता 

क्या भूल गए तुम मुझको 
यदि पी सकता हूँ मैं हाला 
यदि पी सकता हूँ विष का प्याला 
तो तांडव भी मेरा ही नृत्य है 

जब जब जग में हुआ अँधेरा 
जब जब किया पिशाचों ने नृत्य 
धुनि से अपनी मैं उठ कर हूँ आया
तांडव कर त्रिशूल को रक्त है पिलाया 

मत बूझो मुझसे मृत्यु की पहेली 
मत भूलो मेरे त्रिनेत्र की होली 
मैं शिव हूँ और शिव है मुझमें 
भोला हूँ किन्तु संहार बसा है तांडव में॥