Friday, May 1, 2015

नदिया

अठखेलियाँ खाती नदी की धारा से 
सीखा क्या तुमने जीवन में 
क्या सिर्फ तुमने उसकी चंचलता देखी 
या देखा उसका अल्हड़पन 
कभी देखी तुमने उसकी सहिष्णुता 
या कभी देखी उसकी सरलता 

नदिया के प्रवाह में छुपी अपनी कहानी है 
उसकी अठखेलियों में भी 
छुपी जीवन की अटूट पहेली है 
कैसी शांत प्रवृति से एक नदिया 
संपूर्ण जीवन चक्र को चलाती है 
अपनी अल्हड़ता से भी एक पाठ सीखाती है 

प्रकृति के हर स्वरुप में भी नदिया 
नहीं भटकती है कभी ध्येय से 
राह की रुकावट भी कभी रोक नहीं पाती 
नदिया को गंतव्य तक पहुँचने से 
पहाड़ों में कठिन मोड़ हो या मैदानो की सहजता 
किसी भी स्वरुप में नदिया का मनोबल नहीं टूटता 

सीख सकते हो यदि नदिया से तुम कुछ 
तो सीखो सहिष्णुता का पाठ 
प्रकृति के प्रचंड स्वरुप में भी 
नहीं डिगता जिसका कभी ध्येय 
सीख सकते हो तो सीखो नदिया से 
शांति से जीने का पाठ 

Saturday, April 25, 2015

मरता है तो मरने दो

वो मरता है तो मरने दो 
नेता हैं तो क्षमा मांग लेंगे 
उसके मरने से उनको क्या 
वो तो सत्ता के नाम मरता है 

फांसी वो लगाये, चाहे खाए विष 
नेताओं को उससे क्या लेना है 
सत्ता के गलियारों में 
बस दो चार पल उसपर बोलना है 

किसान हो वो, या किसी का पिता 
इससे नेताओं का क्या है जाता 
पति हो किसी का या किसी का बेटा 
मरने से उसका नेताओं का ना कुछ मिटा 

लज्जा ना आई उनको यूँ बतियाते 
फांसी पर चढ़ गया कोई लाचार 
बैठ अपनों से वो करते रहे वार्तालाप 
ना उठ सके उसको लगाने एक हुंकार 

लज्जा ना आई उनको कि शोक मना लें 
जाकर देते हैं बयान, कि हैं क्षमाप्रार्थी 
क्या उनकी क्षमायाचना से 
उठ बैठा इंसान छोड़ अपनी अर्थी॥